रामचरितमानस की वैश्विक प्रासंगिकता

रामचरितमानस की वैश्विक प्रासंगिकता

डॉ . अमलपूरे सूर्यकांत विश्वनाथ

एसोसिएट प्रोफेसर तथा हिंदी विभाग प्रमुख,

डॉ . श्री. नानासाहेब धर्माधिकारी कॉलेज कोलाड, तहसील -रोहा, जिला- रायगड

महाराष्ट्र पिन -४०२३०४

मो . ९७६६७३१४७०

Email sureshamalpure05@gmail.com

सारांश :-

               वर्तमान युग तीव्र परिवर्तन का योग है जहां विज्ञान तकनीक और भौतिक विकास में मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधा प्रदान की है। आज मनुष्य के पास वह सब कुछ है जिसकी कल्पना कभी संभव प्रतीत होती थी । तेज संचार ,उन्नत चिकित्सा  आदि ,इस बाहरी प्रगति के साथ एक गहरी आंतरिक रिक्तता भी जन्म ले चुकी है । जीवन की गति जितनी तेज हुई है मन उतना ही अशांत और स्थिर हो गया है । आध्यात्मिकता केवल एक विकल्प नहीं बल्कि समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बनकर सामने आती है।  भारतीय संस्कृति ने आध्यात्मिकता को जीवन का आधार माना है । यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन जीने की एक ऐसी पद्धति है जो व्यक्ति को समय से जोड़ती है ।ध्यान, जप , योग, यज्ञ और सेवा जैसे साधन मनुष्य की भीतर छिपी दिव्यता को जागृत करने का माध्यम बनते हैं । यह साधन केवल परंपरा नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन के वैज्ञानिक उपाय भी है । जब व्यक्ति नियमित रूप से इसका अभ्यास करता है ,तो उसका मन शांत होता है, विचार शुद्ध होते हैं और जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। भारतीय संस्कृति की विशाल धारा में कुछ ग्रंथ ऐसे है जो केवल अपने समय के लिए नहीं बल्कि युगों युगों तक मानवता के लिए प्रकाश स्तंभ बनकर खड़े रहते हैं । रामचरितमानस ऐसा ही एक अमर ग्रंथ है जिसकी रचना महान संत कवि गोस्वामी तुलसीदास ने की है। यह ग्रंथ केवल भगवान राम की कथा कहा काव्यात्मक वर्णन नहीं बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का जीवंत प्रतिरूप है और वैश्विक प्रासंगिकता के रूप में उसे देखा जा सकता है।

कुंजी शब्द:- भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता ,वैश्विक प्रासंगिकता, लोकमंगल, मर्यादा पुरुषोत्तम आदि।              

DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2604S01V14P002

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