भारतीय ज्ञान प्रणाली में उर्दू का योगदान: भाषा, ज्ञानमीमांसा (Epistemology) और सभ्यता की स्मृतियाँ
डॉ. मोहम्मद रिज़वान¹ एवं डॉ. अशोक बोरकर²
¹ पीएचडी शोधार्थी
समाजशास्त्र विभाग, आरटीएम नागपुर विश्वविद्यालय
² डॉ. अशोक बोरकर
विभागाध्यक्ष, समाजशास्त्र विभाग, आरटीएम नागपुर विश्वविद्यालय
सारांश (Abstract)
उर्दू ने भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System – IKS) के निर्माण में एक आधारभूत किंतु प्रायः अल्प-मान्य भूमिका निभाई है। हालिया शोधों में भारतीय ज्ञान प्रणाली को अब एक स्थिर, शास्त्रीय ग्रंथों के संकलन के रूप में देखने के बजाय एक ऐतिहासिक रूप से गतिशील ज्ञान-पारिस्थितिकी के रूप में समझा जाने लगा है। दक्षिण एशिया में ज्ञान का उत्पादन और संरक्षण कभी भी किसी एक भाषा, लिपि या ज्ञानमीमांसात्मक परंपरा पर निर्भर नहीं रहा है। इसके विपरीत, यह विभिन्न भाषाओं, संस्थानों, सामाजिक समूहों और प्राधिकार के रूपों के बीच निरंतर मध्यस्थता की प्रक्रियाओं पर आधारित रहा है।
साहित्यिक सौंदर्य से परे, उर्दू ऐतिहासिक रूप से प्रशासन, दर्शन, विज्ञान, धर्मशास्त्र, नैतिकता, इतिहासलेखन और सार्वजनिक तर्क-विमर्श की भाषा के रूप में कार्य करती रही है। यह लेख तर्क देता है कि उर्दू केवल एक सांस्कृतिक या काव्यात्मक माध्यम नहीं थी, बल्कि एक ज्ञानात्मक सेतु (epistemic bridge) थी, जो फ़ारसी-इस्लामी बौद्धिक परंपराओं, भारतीय सभ्यतागत ज्ञान और औपनिवेशिक परिस्थितियों में उभरते आधुनिक अनुशासनों के बीच मध्यस्थता करती थी।
उर्दू को IKS के व्यापक ढांचे में स्थापित करते हुए यह अध्ययन दर्शाता है कि किस प्रकार उर्दू ने अरबी-फ़ारसी ज्ञान-पारिस्थितिकियों के बीच सेतु का कार्य किया, बहुलतावादी ज्ञान-उत्पादन में योगदान दिया, ज्ञान के लोकतंत्रीकरण को संभव बनाया तथा सभ्यतागत स्मृति के संरक्षण और संप्रेषण में केंद्रीय भूमिका निभाई। लेख उत्तर-औपनिवेशिक ज्ञान-ढांचों में उर्दू के हाशियाकरण की आलोचनात्मक जांच करता है और समकालीन ज्ञान-विमर्श में इसके पुनःएकीकरण की आवश्यकता पर बल देता है।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2601S01V14P112
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