भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में सामुदायिक विकास
डॉ. प्रशांत एन. शंभरकर
असोसिएट प्रोफेसर
अनिकेत कॉलेज ऑफ सोशल वर्क, वर्धा
E-mail: shambharkarprashant358@gmail.com
सारांश )Abstract)
यह शोध पत्र भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में सामुदायिक विकास की अवधारणा का विश्लेषण करता है तथा महात्मा गांधी द्वारा स्थापित सेवाग्राम को एक व्यवहारिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में सामुदायिक विकास को केवल भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि इसे नैतिकता, आत्मनिर्भरता, सहअस्तित्व, लोककल्याण और सामाजिक समरसता से जोड़ा गया है। बौद्ध एवं जैन दर्शन, तथा ग्राम-आधारित सामाजिक संरचनाओं में निहित लोककल्याण, सर्वोदय जैसी अवधारणाएँ सामुदायिक विकास की सशक्त दार्शनिक पृष्ठभूमि निर्मित करती हैं।
सेवाग्राम भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यावहारिक अनुप्रयोग का सजीव उदाहरण है, जहाँ गांधीजी ने सत्य, अहिंसा, श्रम की गरिमा, स्वावलंबन, स्वदेशी और नैतिक अनुशासन जैसे मूल्यों को ग्राम-जीवन के केंद्र मेंस्थापित किया। इस अध्ययन में सेवाग्राम में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण, खादी एवं कुटीर उद्योग, और सामूहिक श्रम (श्रमदान) जैसी गतिविधियों के माध्यम से सामुदायिक विकास की प्रक्रिया का विश्लेषण किया गया है।
शोध यह स्पष्ट करता है कि सेवाग्राम का विकास मॉडल पश्चिमी औद्योगिक विकास की नकल न होकर भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित मानव-केंद्रित और समावेशी विकास दृष्टि को प्रस्तुत करता है। यह मॉडल आज के वैश्विक विकास विमर्श में भी प्रासंगिक है, विशेषकर सतत विकास, स्थानीय संसाधनों के संरक्षण और सामाजिक न्याय के संदर्भ में। इस प्रकार, सेवाग्राम न केवल एक ऐतिहासिक प्रयोग है, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित सामुदायिक विकास का एक मार्गदर्शक मॉडल भी है।
मुख्य शब्द : भारतीय ज्ञान परंपरा, सामुदायिक विकास, सेवाग्राम, गांधी दर्शन, सर्वोदय, आत्मनिर्भरता, ग्राम स्वराज, सतत विकास
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2601S01V14P058
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