डॉ. विवेकी राय के उपन्यासों का सामाजिक अध्ययन
डॉ. अमलपुरे सूर्यकांत विश्वनाथ
सारांश :-
ग्राम-जीवन और लोक-संस्कृति के प्रति समर्पित रचनाकार डॉ. विवेकी राय का व्यक्तित्व सहज, निश्छल, सहदय और गरिमाशाली है तो कृतित्व वैविध्यपूर्ण, सरल, बहुआयामी एवं यशस्वी है। निराशा और थकान उनके पास नहीं फटकते हैं। सरलता और विनम्रता उनके आभूषण हैं। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों अजातशत्रु है। उनके उपण्यासो में समकालीन यथार्थ का प्रतिबिम्बन कुछ इस ढंग से हुआ है कि गाँवों में बसी भारतीय आत्मा का रेखाचित्र उभरा है। सर्वत्र कथाकार ने निरपेक्ष भाव से चित्रण किया है स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् ग्राम-जीवन में आये बदलाव को नये दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। नारी जीवन की दुर्दशा पर, अशिक्षा और अर्थ के अभाव से पीड़ित ग्राम-जीवन की विकृतियों, असंगतियों,गाँव का समूचा परिवेश, रीति-रिवाज, वस्तु शिल्प और संवेदना उभरी है। प्राचीन मान्यता ऋणभीरुता, परलोक भय के स्थान पर उपजे ऋण प्रतिष्ठा के नये मूल्य ने समाज को खोखला कर दिया है।
कुंजी शब्द :- सामाजिकता नागरी जीवन परंपरा सांस्कृतिक मूल्य औपचारिकता त्योहार मूल्य संक्रमण आदि।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2512S01V13P019
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