शिक्षक प्रशिक्षुओं की पंचकोषीय अवधारणा
* वंदना
’शोधार्थिनी, शिक्षा विभाग हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (केंद्रीय विश्वविद्यालय) श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड
** प्रो. सीमा धवन
** शोध निर्देशिका, प्रोफेसर, शिक्षा विभाग हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (केंद्रीय विश्वविद्यालय) श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड
*** शिल्पी भंडारी
*** शोधार्थिनी, शिक्षा विभाग हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (केंद्रीय विश्वविद्यालय) श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड
सार
पंचकोष शब्द संस्कृत से लिया गया है जिसका तात्पर्य मानव अस्तित्व के पाँच कोषों से है जो अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष हैं। यजुर्वेद में तैत्तिरीय उपनिषद में उल्लेखित पंचकोष की अवधारणा में शरीर, मन और संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली को एक एकीकृत तंत्र के रूप में लिया और समझा जाता है। पंचकोषीय अवधारणा, भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) की आधारशिला है, जो मानव अस्तित्व और कल्याण पर समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। यह हमारे शारीरिक, ऊर्जावान, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक आयामों के अंर्तसंबंध पर बल देता है। विकास की अवधारणा को आधार बनाते हुए नयी शिक्षा नीति 2020 दस्तावेज के आधार पर भारतीय विद्यालयी पाठ्यचर्या रूपरेखा 2022 को तैयार किया गया है, जिसकी उपयोगिता के आधार पर इस अवधारणा को अन्य शैक्षिक स्तरों पर भी लागू किया जा सकता है। अतः पंचकोषीय समग्र विकास के प्रति सेवारत शिक्षकों एवं शिक्षक प्रशिक्षुओं की अभिवृत्ति का अध्ययन किया गया है। शोध कार्य में मात्रात्मक शोध विधि का प्रयोग किया गया है। यह शोध नई शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में पंचकोषीय समग्र विकास के प्रति शिक्षकों एवं छात्र प्रशिक्षुओं की अभिवृति को जानने में एवं पंचकोषीय अवधारणा के प्रति जागरूक करने में सहायक सिद्ध होगा, जिससे कि छात्र एवं शिक्षक कक्षा-कक्ष में पंचकोष के ज्ञान की महत्वता एवं उपयोगिता से लाभान्वित हो सके।
कुंजी शब्द (Key-words) – पंचकोष, समग्र विकास, पंचकोषीय समग्र विकास, महत्वता एवं उपयोगिता, शिक्षकों एवं शिक्षक प्रशिक्षु, अभिवृति।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2505S01V13P009
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