कबीरदास के साहित्य की वर्तमान प्रासंगिकता
डॉ. सत्वशिला गंगाधर माने
सारांश
कबीरदास हिंदी साहित्य के निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख संत कवि और समाज सुधारक हैं। उनके साहित्य में निर्गुण, ईश्वर में विश्वास, समाज में व्याप्त बाह्याडंबरो व जाति-पाति का कडा दर्श विरोध, गुरु का महत्व, रहस्यवाद, प्रेम की महत्ता आदि गुण हमें दिखाई देते हैं। उन्होंने अपनी रचनाएँ आम बोलचाल की भाषा में लिखी थीं। राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी और ब्रजभाषा के शब्दों का मिश्रित रूप था। कबीरदास के साहित्य की मुख्य भाषा सधुक्कड़ी और पंचमेल खिचड़ी है। कबीरदास का साहित्य वर्तमान में भी अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि उनके विचार आडंबरहीन भक्ति,मानवता, सामाजिक समरसता और नैतिकता पर आधारित हैं, जो आज की जाति-पाती, साम्प्रदायिकता और दिखावे वाली दुनिया के लिए एक सार्थक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उनके दोहे आज के समय में भी सत्य, प्रेम और आंतरिक शुद्धी का पाठ पढ़ाते हैं।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2604S01V14P011
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