भारतीय ज्ञान प्रणाली में दलित, आदिवासी और वंचित समुदायों की भूमिका और योगदान

भारतीय ज्ञान प्रणाली में दलित, आदिवासी और वंचित समुदायों की भूमिका और योगदान

डॉ. रविंद्र सहारे

अनिकेत कॉलेज ऑफ सोशल वर्क, वर्धा

सारांश

भारतीय ज्ञान परंपरा के उस उपेक्षित पक्ष को मध्यस्थान में लाने का प्रयास करता है, जिसे ऐतिहासिक रूप से शास्त्रीय, अभिजन और लिखित ज्ञान परंपराओं के वर्चस्व के कारण हाशिये पर रखा गया। भारतीय ज्ञान प्रणाली को धर्मऔर संस्कृत-आधारित ग्रंथों तक सीमित कर दिया गया है, जबकि वास्तविकता यह है कि भारतीय ज्ञान का स्वरूप अत्यंत व्यापक, बहुस्तरीय और बहुसांस्कृतिक रहा है। इस व्यापक ज्ञान-परिसर के निर्माण, संरक्षण और निरंतर प्रवाह में दलित, आदिवासी और अन्य वंचित समुदायों की भूमिका आधारभूत और निर्णायक रही है।

            दलित समुदायों का योगदान विशेष रूप से श्रम-संस्कृति, शिल्पकला, कृषि-तकनीक, धातुकर्म, निर्माण, स्वच्छता, लोकधर्म और सामाजिक नैतिकता के क्षेत्र में दिखाई देता है। इन समुदायों ने अपने दैनिक जीवन के अनुभवों से ऐसा व्यावहारिक ज्ञान विकसित किया जिसने समाज की आर्थिक और सामाजिक संरचना को स्थायित्व प्रदान किया। यह ज्ञान पुस्तकों में संकलित न होकर कार्य, परंपरा और व्यवहार के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा, जिससे भारतीय ज्ञान प्रणाली का व्यवहारिक पक्ष समृद्ध हुआ।

            आदिवासी समुदायों का योगदान प्रकृति-आधारित ज्ञान, वन प्रबंधन, जैव-विविधता संरक्षण, औषधीय ज्ञान, पर्यावरणीय संतुलन और सामुदायिक जीवन मूल्यों में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। आदिवासी ज्ञान परंपरा में मनुष्य और प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व का दर्शन निहित है, जो आधुनिक पर्यावरणीय संकटों के समाधान हेतु भी प्रासंगिक है। आदिवासी समाज द्वारा विकसित औषधीय पौधों का ज्ञान, मौसम की समझ, कृषि चक्र और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग की अवधारणाएँ भारतीय ज्ञान प्रणाली को समृद्ध करती हैं।

            वंचित समुदायों की मौखिक परंपराएँ- जैसे लोकगीत, लोककथाएँ, मिथक, कहावतें, अनुष्ठान, पर्व और सांस्कृतिक प्रतीक-ज्ञान के ऐसे वैकल्पिक स्रोत हैं, जो जीवन, समाज और संघर्ष के अनुभवों को अभिव्यक्त करते हैं। ये परंपराएँ न केवल सांस्कृतिक स्मृति को संरक्षित करती हैं, बल्कि सामाजिक चेतना, प्रतिरोध और आत्मसम्मान की भावना को भी पोषित करती हैं। मौखिक ज्ञान परंपरा लिखित ग्रंथों के समान ही वैचारिक गहराई और सामाजिक उपयोगिता रखती है, किंतु अकादमिक विमर्श में इसे लंबे समय तक गौण माना गया।

            यह शोध भारतीय ज्ञान प्रणाली का पुनर्पाठ सामाजिक न्याय, समावेशन और ज्ञान के लोकतंत्रीकरण के दृष्टिकोण से करता है। अध्ययन यह स्थापित करता है कि दलित, आदिवासी और वंचित समुदाय केवल ज्ञान के उपभोक्ता नहीं रहे, बल्कि वे ज्ञान के सृजनकर्ता, संवाहक और संरक्षक रहे हैं। शोध का निष्कर्ष यह है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को यदि समग्र और प्रामाणिक रूप में समझना है, तो उसमें इन समुदायों के योगदान को केंद्रीय स्थान देना अनिवार्य है। इससे न केवल ऐतिहासिक अन्याय का बौद्धिक परिमार्जन होगा, बल्कि एक अधिक समावेशी और मानवीय ज्ञान-दृष्टि का विकास भी संभव होगा।

मुख्य शब्द- भारतीय ज्ञान प्रणाली, दलित समुदाय, आदिवासी समुदाय, वंचित वर्ग, लोकज्ञान, मौखिक परंपरा, श्रम-संस्कृति, प्रकृति-आधारित ज्ञान, सामाजिक समावेशन, ज्ञान का लोकतंत्रीकरण, सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक न्याय

DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2601S01V14P069

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