भारतीय सामाजिक संरचना में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था एवं पितृसत्तात्मक मूल्यों के संदर्भ में महिलाओं की अधीन स्थिति पर संवैधानिक हस्तक्षेपों का विश्लेषणात्मक अध्ययन
प्रियंका सिंह१,डॉ. अशोक बोरकर२
शोधार्थी, समाजशास्त्र विभाग, तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
सह-मार्गदर्शक, समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष, समाजशास्त्र विभाग, तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
परिचय:
भारतीय समाज की पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं के विश्लेषण से यह विदित होता है कि चातुर्वर्ण्य व्यवस्था, पुरुषसत्तात्मक सामाजिक ढांचा, तथा महिलाओं की द्वितीयक स्थिति – इन तीनों तत्वों ने मिलकर ऐसी सामाजिक व्यवस्था को जन्म दिया, जिसमें असमानता, सामाजिक विभाजन और शक्ति के एकतरफा केंद्रीकरण को संस्थागत स्वरूप प्राप्त हुआ। प्रारंभ में गुण और कर्म पर आधारित रही चातुर्वर्ण्य व्यवस्था समय के साथ जन्म के आधार पर कठोर सामाजिक श्रेणीकरण में परिवर्तित हो गई, और सामाजिक प्रतिष्ठा से क्रमशः वंचित किया गया।
साथ ही, पुरुषप्रधान सामाजिक व्यवस्था ने महिलाओं की सामाजिक भागीदारी को सीमित करते हुए उन्हें पारिवारिक और घरेलू भूमिकाओं तक सीमित रखा। परिणामस्वरूप, स्त्रियाँ निर्णय-निर्माण, शिक्षा, संपत्ति के अधिकार, धार्मिक नेतृत्व तथा सार्वजनिक जीवन के अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों से बहिष्कृत रहीं। यह सामाजिक ढांचा महिलाओं को एक स्वतंत्र और स्वायत्त इकाई के रूप में स्वीकार न कर उन्हें आश्रित और अधीनस्थ भूमिका में परिभाषित करता रहा।
इस प्रकार, चातुर्वर्ण्य प्रणाली और पितृसत्तात्मक मूल्यों के समन्वय से उत्पन्न संरचनात्मक असमानताओं ने भारतीय समाज की समरसता को गहराई से प्रभावित किया है। इस व्यवस्था ने न केवल स्त्री-पुरुष समता की अवधारणा को बाधित किया, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवाधिकार जैसे लोकतांत्रिक आदर्शों की प्रगति को भी अवरुद्ध किया। अतः इन ऐतिहासिक-सामाजिक संरचनाओं की गंभीर समीक्षा करते हुए उनके प्रभावों को समझना और समावेशी सामाजिक पुनर्गठन की दिशा में विचारशील नीति-निर्माण करना अत्यंत आवश्यक है।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2601S01V14P063
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