सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के काव्य में निहित प्रगतिवादी चेतना
(विशेष संदर्भ- तोड़ती पत्थर कविता)
प्रा.डॉ.मनोज सुभाष जोशी, सहयोगी प्राध्यापक,
हिन्दी विभाग प्रमुख,
श्री शिवाजी कला व वाणिज्य महाविद्यालय,अमरावती (महाराष्ट्र) 444601
निराला के काव्य में प्रगतीवादी चेतना का स्वर अत्यंत प्रबल दिखाई देता है | निराला ने अपने काव्य मी शोषकों के प्रति आक्रोश को प्रकट कर उपेक्षितों की व्यथा को पहचाना है तथा उन्हें उनका हक प्रदान करने की छटपटाहट अपने साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत की है | उन्होंने जो भी लिखा है वह न केवल अद्भुत, अप्रतिम, निराला रहा बल्कि अपने आपने सर्वश्रेष्ठ रहा हैं | जैसे कि हिंदी साहित्य की छायावादी सुकुमारता की महक ‘जुही की कली’, सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य कविता ‘कुकुरमुत्ता’, सर्वश्रेष्ठ शोक गीत सरोज स्मृति, सर्वश्रेष्ठ भक्ति की शक्ति को प्रतिपादित करती कवितायें तुलसीदास एवं ‘राम की शक्ति पूजा’ आदि निराला की अमर रचनाओं में निरालापन और सर्वश्रेष्ठता का अद्भुत समन्वय हमें दिखाई देता हैं |
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2512S01V13P021
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