निंबार्काचार्य तथा वल्लाभाचार्य के मोक्ष मार्ग की व्यवहारिक प्रासंगिकता
सोनिया वैष्य
षोधार्थी, दर्शनशास्त्र विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विद्यापीठ, नागपुर-440033
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डॉ. अतुल महाजन
प्राध्यापक एवं विभाग प्रमुख, दर्शनशास्त्र विभाग, रेणुका महाविद्यालय, नागपुर
सारांष
निंबार्काचार्य तथा वल्लाभाचार्य, मध्यकालीन उत्तर भारतीय वैष्णव भक्ति परंपरा के प्रमुख आचार्य माने जाते है। निंबार्काचार्य का द्वैताद्वैत दर्षन तथा वल्लाभाचार्य का षुद्धाद्वैत दर्षन, भक्ति मार्ग पर आधारित है, किंतु उनके व्याख्या एवं साधना प्रक्रिया में भिन्नताएँ दिखाई देती है। निंबार्काचार्य के मत अनुसार आत्मा मोक्ष में निर्विध्न ्रहती है। मोक्षावस्था में भी आत्मा ईश्वर के अधीन रहती है। निंबार्काचार्य ने मोक्ष प्राप्ति हेतु पाँच साधन बताये हैं, जिसमें प्रपत्ति या ईश्वरशरणता प्रमुख है। वहीं वल्लभाचार्य, कृष्णभक्ति के उच्चतम स्तर को प्राप्त करना ही मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र साधन बताते हैं। इसी हेतु उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के दो मार्ग बताये हैं- मयार्दामार्ग तथा पुष्टिमार्ग।
यह षोध यह प्रतिपादित करता है कि दोनों आचार्यों का भक्ति प्रधान मार्ग आज भी व्यक्ति के नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन को संतुलित करने में सहायक है। इस प्रकार निंबार्काचार्य तथा वल्लभाचार्य द्वारा दिए गए मोक्ष मार्ग न केवल वेदांतिक पंरपरा में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं, बल्कि आधुनिक युग में व्यक्ति के आस्था और आत्मिक उन्नति में भी सहायक हैं।
संकेेत षब्दः निंबार्काचार्य, वल्लाभाचार्य, द्वैताद्वैत, षुद्धाद्वैत, मोक्ष मार्ग, प्रपत्ति और पुष्टिमार्ग ।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2512S01V13P007
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