अथर्ववेदीय लोक संस्कृति – एक विचार
ज्योति गुप्ता
शोधच्छात्रा
संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर।
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संस्कृति शब्द ब्रह्मा के समान ही अवर्णनीय है, जिस प्रकार ब्रह्मा व्यापक, सर्व अंतर्यामी एवं अनेक गुण धर्मों से युक्त हैं ठीक उसी प्रकार से यह लोक भी संस्कृति अनेक गुण धर्मों से युक्त है। लोक संस्कृति के माध्यम से रीति-रिवाज, कला, संगीत, नृत्य, धर्म इत्यादि जनमानस के भीतर उत्पन्न होता है। संस्कृति किसी देश, राज्य, प्रान्त आदि के समग्र गुणों का विकसित रूप है। संस्कृति को अंग्रेजी में हम “Culture” शब्द से अभिहित करते हैं। जो कि लैटिन भाषा के “कल्ट“ या “कल्टस“ से निर्मित हुआ है। जिसका अर्थ होता है, विकसित करना, परिष्कृत करना आदि यदि अतः में कहा जाय तो जनमानस के आन्तरिक प्रवृत्तियों से जो कुछ भी विकसित हुआ है, वह सब “लोक संस्कृति“ में समाहित है। लोक संस्कृति जनसाधारण की संस्कृति है, यदि अथर्ववेद का सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया जाय तो उससे यह ज्ञात होता है कि यह लोक संस्कृति का परिचायक है, जिसमें जीवन-दर्शन, रहन-सहन, परम्पराओं, प्रार्थनाओं आदि का संलग्न है। अथर्ववेदीय लोक संस्कृति आज के समय में जनसाधारण को अनेक प्रकार से सिंचित करने का कार्य करती है, जैसे-दया, परोपकार, सदाचार, सहानुभूति, सहिष्णुता, सद्भावना, त्याग, नैतिकता इत्यादि जो मानवता के विकास में उपादेय सिद्ध होती है। यह वेद जन साधारण का वेद है जिसमें जनमानस की समस्त झांकी का साक्षात दर्शन प्राप्त होता है। निःसंदेह अथर्ववेद लोक संस्कृति का दर्पण है।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2508S01V13P007
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