डॉ. विवेकीराय के निबंध : एक विवेचन
डॉ. अमलपुरे सूर्यकांत विश्वनाथ
( अध्यक्ष हिंदी विभाग)
डॉ. श्री. नानासाहेब धर्माधिकारी कॉलेज कोलाड, रायगड
महाराष्ट्र पिन – 402304
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सारांश :-
स्वातंत्र्योत्तर युग में निबंधों का विषय वैविध्य तथा भाषाशैली की दृष्टि से बहुमुखी विस्तार हुआ है। पश्चिम की विभिन्न विचारधाराओं-मार्क्सवाद, समाजवाद तथा ज्ञान-विज्ञान के विकास के कारण इन निबंधों में जीवन के विविध आयामों राजनीति, समाज, संस्कृति, धर्म आदि पर नवीन दृष्टि से किया गया है चिंतन- मनन लक्षित होता है। भाषा और शैली के स्तर पर भी इस युग के निबंधों में अन्य गद्य विधाओं-कहानी, उपन्यास, संस्मरण, गद्य काव्य, यात्रा वृत्तांत, रेखाचित्र, डायरी, रिपोतार्ज आदि का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। स्वातंत्र्योत्तर युग की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि हजारीप्रसाद द्विवेदीके निबंध हैं जिन्होंने आ. रामचंद्र शुक्ल के पश्चात हिन्दी निबंध साहित्य को एक नवीन दिशा प्रदान की है। इस कालखंड में तीन पीढ़ियों के लेखक एक साथ निबंध लेखन में संलग्न हैं- रामवृक्ष बेनीपुरी, जैनेंद्र कुमार, श्रीमती महादेवी वर्मा, रामनारायण उपाध्याय, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, देवेन्द्र सत्यार्थी, रामचारी सिंह ‘दिनकर’, भगवतीशरण उपाध्याय, प्रभाकर माचवे, अमृतराय, ठाकुर प्रसाद सिंह, श्रीलाल शुक्ल, विद्यानिवास मिश्र, धर्मवीर भारती, डॉ. विवेकी राय, रघुवीर सहाय, कुबेरनाथ राय, रमेश चन्द्र शाह, डॉ. रामदरश मिश्र, डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र, महेन्द्रनाथ पाण्डेय, राम अवध शास्त्री, श्यामसुंदर दुबे, श्रीराम परिहार, उमेश प्रसाद सिंह आदि उल्लेखनीय हैं। इनमें से मेरे दृष्टिकोण में विवेकी राय वरिष्ठ निबन्धकार की कोटी में हैं जो पहले से लिखते आ रहे हैं।
कुंजी शब्द :- निबंध, ग्राम जीवन, समाजिकता, मूल्य बोध, हड़पनीति, मनुष्यहीनता आदि।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2602S02V14P003
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