‘मैं हिजड़ा….मैं लक्ष्मी‘: वैश्विक परिप्रेक्ष्य में परालैंगिक समुदाय की स्थिति का चित्रण
डॉ. सन्मुख नागनाथ मुच्छटे,
सहयोगी प्राध्यापक, हिंदी विभाग, श्री छत्रपती शिवाजी महाविद्यालय,
उमरगा, जिला धाराशिव(महाराष्ट्र)
मो. नंबर:९६८९०६३७१५
Email-sunmukhm@gmail.com
शोध–सार:
प्रस्तुत आलेख परालैंगिक समुदाय की ऐतिहासिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्थिति के बहुआयामी स्वरूप का गहन विवेचन करता है। प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आधुनिक भारत एवं वैश्विक परिप्रेक्ष्य तक इस समुदाय की उपस्थिति, स्वीकार्यता और संघर्ष को साहित्य एवं सामाजिक जीवन के संदर्भ में परखा गया है। लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा “मैं हिजड़ा… मैं लक्ष्मी” इस समुदाय की सामूहिक पीड़ा, साहस और आत्मस्वीकृति का सशक्त दस्तावेज़ है। इसमें भारतीय समाज की बहिष्कृत मानसिकता के साथ-साथ पश्चिमी और एशियाई देशों में परालैंगिक व्यक्तियों की तुलनात्मक स्थिति प्रस्तुत की गई है। आलेख का निष्कर्ष यह प्रतिपादित करता है कि परालैंगिकता कोई विकृति नहीं, बल्कि प्राकृतिक लैंगिक विविधता है, जिसे स्वीकार करना और सम्मान देना सामाजिक न्याय एवं मानवाधिकार की अनिवार्यता है।
मुख्य शब्द: परालैंगिक समुदाय, तीसरा लिंग, मैं हिजड़ा… मैं लक्ष्मी, लैंगिक विविधता, औपनिवेशिक कानून, NALSA निर्णय 2014, परालैंगिक व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019, मानवाधिकार विमर्श, सामाजिक स्वीकृति, वैश्विक तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2508S01V13P013
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