आधुनिक संस्कृत महाकाव्य परम्परा में श्री बोधिसत्त्व चरितम् – एक अध्ययन
डॉ0 ओम नारायण
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भारतीय संस्कृति को विद्वानों ने चार वर्गों में विभाजित किया है जो वेद, व्याकरण, दर्शन व साहित्य के रूप में हैं, साथ ही संस्कृत के इतिहास को भी विद्वानों ने दो वर्गों में विभाजित किया है – वैदिक संस्कृत साहित्य एवं लौकिक संस्कृत साहित्य। वैदिक परम्परा में भी सर्वप्रथम श्रुति परम्परा प्रचलित थी, क्योंकि इस समय शिक्षा-दीक्षा (ज्ञान) गुरु-शिष्य के मध्य मौखिक ही हुआ करती थी। पुनः आगे चलकर लौकिक संस्कृत साहित्य के अन्तर्गत आदि कवि वाल्मीकिकृत रामायण तथा महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत की रचना क्रमशः हुई और आगे चलकर इन्हीं दो ग्रन्थों को आधार बनाकर संस्कृत साहित्य के अन्तर्गत जितने भी प्रमुख महाकवि हुए उन्होंने अनेक प्रकार के ग्रन्थों की सर्जना की। जिसमें प्रमुख रूप से महाकवि कालिदास कृत रघुवंशमहाकाव्यम्, कुमारसम्भवम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम् इत्यादि हैं भास कृत – प्रतिमानाटक, उरुभंग, दूतघटोत्कच आदि, भारविंकृत-किरातार्जुनीयम्, महाकवि माघकृत-शिशुपालवधम्, श्रीहर्ष कृत नैषधीयचरितम्, ये उक्त तीनों रचनाएं संस्कृत साहित्य में बृहत्त्रयी के अन्तर्गत माने जाते हैं। इनके अतिरिक्त भी संस्कृत साहित्य की परम्परा में और भी महाकाव्य प्रचलित हुए हैं।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2508S01V13P002
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