भारतीय ज्ञान परंपरा और दलित मुक्ति का वैचारिक संघर्ष
Dr.Lokesh B. Nandeshwar
Aniket College of Social Work,
Wardha. Mo.: 8483898020
सारांश–
भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध बौद्धिक परंपराओं में से एक मानी जाती है। इसमें वेद, उपनिषद, बौद्ध-जैन दर्शन, भक्ति साहित्य, लोक परंपराएँ तथा आधुनिक विचारधाराएँ सम्मिलित हैं। किंतु इस व्यापक ज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा है कि इसे लंबे समय तक जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था के संरक्षण और औचित्य के लिए प्रयुक्त किया गया। विशेष रूप से ब्राह्मणवादी ग्रंथों और व्याख्याओं ने वर्ण-व्यवस्था और जाति-भेद को धार्मिक और दार्शनिक आधार प्रदान किया, जिससे दलित समुदायों को ज्ञान, शिक्षा और सांस्कृतिक अधिकारों से वंचित रखा गया। इस संदर्भ में दलित मुक्ति का संघर्ष केवल सामाजिक या राजनीतिक ही नहीं, बल्कि मूलतः वैचारिक और ज्ञानात्मक भी रहा है।
दलित समाज की ऐतिहासिक स्थिति को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम भारतीय ज्ञान परंपरा के भीतर निहित सत्ता संरचनाओं को पहचानें। मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्रीय ग्रंथों ने शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा, वेदाध्ययन और सामाजिक उन्नति से वंचित किया। ज्ञान को सवर्णों की बपौती बना दिया गया, जिससे समाज में बौद्धिक और सांस्कृतिक असमानता स्थायी रूप से स्थापित हो गई। इस व्यवस्था ने दलितों को न केवल आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर रखा, बल्कि उनके अनुभवों और जीवन-दृष्टि को भी “अज्ञान” के रूप में खारिज किया। इसके विपरीत, दलित चिंतन ने ज्ञान की एक वैकल्पिक परंपरा विकसित की, जो श्रम, अनुभव और मानवीय गरिमा पर आधारित थी। बुद्ध का दर्शन, भक्ति आंदोलन के संत कबीर और रैदास की वाणी, तथा फुले और आंबेडकर का आधुनिक चिंतन इसी प्रतिरोधी ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इन विचारकों ने न केवल जाति-व्यवस्था की आलोचना की, बल्कि यह भी दिखाया कि सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को स्वतंत्र, समान और सम्मानित जीवन की ओर ले जाए। डॉ. आंबेडकर ने विशेष रूप से यह स्पष्ट किया कि ब्राह्मणवादी ज्ञान परंपरा सामाजिक अन्याय को बनाए रखने का एक उपकरण रही है, और दलित मुक्ति के लिए उसका पुनर्पाठ और पुनर्निर्माण अनिवार्य है।
इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा और दलित मुक्ति के बीच संबंध केवल विरोध का नहीं, बल्कि पुनर्संरचना का भी है। दलित आंदोलन ने ज्ञान की अवधारणा को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास किया, जहाँ सभी समुदायों के अनुभव, इतिहास और संस्कृति को मान्यता मिले। यह संघर्ष इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता है कि “कौन सा ज्ञान वैध है और किसका अनुभव इतिहास में दर्ज होगा?” दलित विमर्श ने इस एकाधिकार को तोड़ते हुए बहुजन समाज की दृष्टि को भारतीय बौद्धिक परंपरा के केंद्र में लाने का प्रयास किया है।
निष्कर्षतः यह रेखांकित करता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा को दलित-समावेशी दृष्टि से पुनर्परिभाषित करना समय की आवश्यकता है। जब तक ज्ञान की संरचनाएँ सामाजिक समानता और न्याय के मूल्यों से नहीं जुड़ेंगी, तब तक दलित मुक्ति अधूरी रहेगी। भारतीय समाज की सच्ची बौद्धिक और नैतिक उन्नति तभी संभव है जब ज्ञान परंपरा सभी के लिए समान रूप से सुलभ और सम्मानजनक बने।
मुख्य शब्द– भारतीय ज्ञान परंपरा, दलित विमर्श, ब्राह्मणवाद, सामाजिक न्याय, आंबेडकर, बहुजन दृष्टि, ज्ञान और सत्ता
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2601S01V14P036
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