सूर्यबाला के साहित्य में व्यंग्य के अन्य रूप
1रतनलाल नंगारची, शोधकर्त्ता, हिन्दी विभाग,
माणिक्यलाल वर्मा, श्रमजीवी महाविद्यालय, जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ
(डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) उदयपुर, राजस्थान
परिचय
व्यंग्य’ शब्द हिन्दी का नहीं, बल्कि मूलतः संस्कृत भाषा का शब्द है। संस्कृत में इसकी व्युत्पत्ति ‘अञ्ज्’ धातु में ‘वि’ उपसर्ग और ‘ण्यत्’प्रत्यय जोड़ने से हुई है, जिससे ‘व्यंग्य’शब्द का निर्माण हुआ । इस प्रकार ‘व्यंग्य’का शाब्दिक अर्थ होता है ‘विकृत’, ‘विरूप’ या ‘विकलांग’। यह विकृति या विरूपण ही व्यंग्य का मूल तत्व है। “कल्पद्रुम” में भी इस शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गई है— “विकृतानि अङ्गानि यस्मात्” अर्थात् वह, जो विकलांगता को उजागर करता है, वही ‘व्यंग्य’ कहलाता है। जब ‘व्यंग’शब्द में ‘व्यत्’ प्रत्यय जोड़ा जाता है, तो यह ‘व्यंग्य’ में बदल जाता है। इस प्रकार, ‘व्यंग्य’वह साहित्यिक रूप है जो समाज या किसी व्यक्ति की विकलांगताओं को स्पष्ट रूप से सामने लाता है और उसे उजागर करता है। ‘व्यंग्य’ और ‘व्यंग’ को लेकर समाज में बहुत मतभेद पाए जाते हैं। कुछ लेखक ‘व्यंग्य’ शब्द को स्वीकार करते हैं, जबकि कुछ ‘व्यंग’ शब्द का उपयोग करते हैं। इस संदर्भ में प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी ने कहा था, “मैं व्यंग्य नहीं, व्यंग लिखता हूँ, क्योंकि मुझे ऐसा बोलना सहज लगता है।” उनके बाद के कई व्यंग्यकारों ने उनके उदाहरण का पालन किया और अपनी रचनाओं को ‘व्यंग’ के नाम से प्रकाशित किया। यह दोनों ही संस्कृत के शब्द हैं, किंतु कभी-कभी अपवादों को छोड़कर ‘व्यंग्य शब्द को अधिक मान्यता दी जाती है। वर्तमान समय में ‘व्यंग्य’ को अंग्रेजी में ‘सटायर’ के रूप में संदर्भित किया जा रहा है। ‘सटायर’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सैटुरा’ शब्द से हुई है, जिससे धीरे-धीरे ‘सटायर’ शब्द का प्रयोग होने लगा। इस प्रकार, भले ही ‘व्यंग्य’ को अंग्रेजी में ‘सटायर’ का हिंदी अनुवाद मान लिया गया हो, लेकिन यह ‘सटायर’ शब्द व्यंग्य के निहित अर्थ को पूरी तरह से अभिव्यक्त नहीं कर पाता। व्यंग्य समाज की विभिन्न विसंगतियों और त्रुटियों को उजागर करने का एक सशक्त साधन है, जो समाज के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक पहलुओं में विद्यमान दोषों को सामने लाने का प्रयास करता है। इसके माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं पर गहरी और तीव्र दृष्टि डाली जाती है, ताकि सुधार के लिए जागरूकता उत्पन्न की जा सके। व्यंग्य की विशेषता यह है कि यह अपनी तीव्र और कटु भाषा में सुधार की प्रक्रिया को साकार करने की दिशा में कार्य करता है। व्यंग्य समाज की विकलांगता और उसके वास्तविक रूप को अत्यंत स्पष्ट रूप से उजागर करता है, ताकि लोग इन समस्याओं पर विचार करें और उन्हें हल करने के प्रयासों में सक्रिय रूप से भाग लें। यह न केवल समाज के दोषों को उजागर करता है, बल्कि एक सुधारात्मक दृष्टिकोण को भी प्रस्तुत करता है, जिससे सामाजिक परिवर्तन और विकास की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए जा सकें।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2508I8VXIIIP0004
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