हिंदी फिल्म साहित्य में दिव्यांगता
डॉ. मनोज शर्मा
9868310402
शोध सार
भारतीय सिनेमा में दिव्यांगता के पहले के चित्रण ने “फिक्सिंग” अक्षमता की ओर एक असमान पथ का अनुगमन किया, अर्थात, एक दिव्यांग व्यक्ति एक सशक्त एवं सक्षम व्यक्ति से मिलता है जो उन्हें एक खुशहाल जीवन जीने के लिए उनकी दिव्यांगता को देखने में मदद करता है। अस्मितामूलक विषयों में विकलांग विमर्श एक सार्थक विमर्श के रूप में देखा जाता है। सिनेमा अपने बदलते समय में केवल एक मनोरंजन मात्र न सामाजिक चित्रण का हिस्सा है। सिनेमा जनसंचार का सशक्त माध्यम है। अंधा, लंगड़ा, लूला, मूक-बधिर,अपंग जैसे शब्दों के प्रयोग उपेक्षा की दृष्टि से किये जाते हैं। इनके प्रति यह भावना समाज में इनकी भौतिक स्थिति को कमजोर करती ही है, साथ ही इनकी मानसिकता को भी कमज़ोर करती है।
बीज शब्द : संस्कृति, दिव्यांग, फ़िल्म साहित्य, विकलांग, उपेक्षित, जीवन, भारतीय सिनेमा
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2508I8VXIIIP0002
Download