बिरसा मुंडा का आंदोलन

बिरसा मुंडा का आंदोलन

डॉ. माया बी.  मसराम

शरदराव पवार कला व वाणिज्य महाविद्यालय

गडचांदूर ता.कोरपना जि. चंद्रपूर (महाराष्ट्र)

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सारांश

जब लोग आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले बिरसा मुंडा का नाम मन में आता है। उनके संघर्ष का फल आदिवासियों के लिए एक विशेष कानून का निर्माण था। उनके संघर्ष का ही परिणाम था कि उनकी मृत्यु के बाद स्वतंत्रता की लौ और भी प्रज्वलित हो गई। आज, उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष 15 नवंबर को आदिवासी गौरव दिवस मनाया जाता है। बिरसा मुंडा का आंदोलन, जिसे “उलगुलान” या “मुंडा बांध” के नाम से भी जाना जाता है, 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश शासन और जमींदारों के शोषण के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण आदिवासी विद्रोह था। यह आंदोलन 1899-1900 में झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में हुआ था। बिरसा मुंडा ने मुंडा जनजाति को एकजुट किया और पारंपरिक भूमि अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए संघर्ष किया। बिरसा मुंडा का आंदोलन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में झारखंड और उसके आसपास के आदिवासी इलाकों में एक प्रमुख जन आंदोलन था। यह आंदोलन मुख्य रूप से आदिवासियों के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए था। बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश शासन के तहत ईसाई धर्म अपनाने, ज़मींदारी प्रथा, उत्पीड़न और शोषण के विरुद्ध आदिवासियों को संगठित किया। उन्होंने “उलगुलान” (महान विद्रोह) का नेतृत्व किया और आदिवासियों को अपने धर्म, संस्कृति और भूमि की रक्षा के लिए प्रेरित किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि आदिवासी अपनी खोई हुई ज़मीन और पहचान वापस पा सकते हैं।

मुख्य शब्द:- उलगुलान, संघर्ष, ज़मीन, अधिकार, सांस्कृतिक पहचान, उत्पीड़न, शोषण, अधिकारों की सुरक्षा

DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2507S01V13P008

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