वन आंदोलन और सुंदरलाल बहुगुणाजी का योगदान
आरती जोशी
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग
शोध निर्देशक
डॉक्टर मोना
विभागाध्यक्ष इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, देव संस्कृति विश्वविधालया ।
सारांश – वन प्राचीन काल से ही मनुष्य के जीवन यापन के केन्द्र रहे है जिससे उपयोगितावाद के सिद्धांत को बल प्राप्त हुआ | वन से ही सभ्यता एवं संस्कृतियों के सांस्कृतिक एवं आर्थिक तत्व जुड़े हुए थे | इतिहास साक्षी रहा है कि, जहाँ पर वनों का आवरण हटा और हमारी धरा नग्न हुई, वहीं प्राकृतिक आपदाओं का कोप भी सहन करना पड़ा | वृक्षविहीन भूमि पर भूक्षरण तथा भूस्खलन जैसे भयावह दुर्घटनाओं की पुर्नावृत्ति हुई है | आधुनिक समय की उपयोगवादी – भौतिकवादी संस्कृति ने मनुष्य को प्रकृति का हत्यारा सिद्ध किया है | वैदिक काल में जहाँ मनुष्य प्रकृति पूजन वही वर्तमान समय में मनुष्य प्रकृति का शत्रु बन बैठा है | इसी कारण पर्यावरण के बचाव के लिए तथा इसके अनियंत्रित दोहन पर रोक लगाने हेतु जल, जंगल और जमीन बचाने के संघर्ष के लिए कई महापुरुष उत्तराखण्ड की पवित्र एवं पुण्य धरती पर अवतरित हुए| इन्ही में से एक थे सुंदरलाल बहुगुणा जिनके तत्वाधान में उत्तराखण्ड में नए वन आंदोलन ने जन्म लिया तथा जो अन्य स्थानों पर भी चलने वाले पर्यावरणीय आंदोलन के प्रेरणा श्रोत बने |
कूट शब्द : पर्यावरण, अत्याचार, पदयात्रा चिपको, अप्पिको, आंदोलन, प्रतिबंध
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2507I7VXIIIP0001
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