नारदीय शिक्षा में उच्चारण-विधि एवं सम्यकोच्चारण-उपाय हेतु पदार्थों का विश्लेषण
रतन पाठक (शोधच्छात्र)
संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग
दी०द०उ०गो०वि०वि० गोरखपुर
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शोध सारांश-
वेदाङ्गों में पहला अङ्ग शिक्षा है, जो वेद के मन्त्रों का ठीक-ठीक उच्चारण करने में सहायक है। शिक्षा का अर्थ है, वह विद्या जो स्वर वर्ण आदि उच्चारण के प्रकार का उपदेश दे, वेदाङ्गों में शिक्षा का एक महत्वपूर्ण स्थान है, नारदीय शिक्षा में शुद्ध उच्चारण के महत्ता को बताते हुए कहा गया है कि जो स्वर और वर्ण के शुद्ध उच्चारण से हीन विकृत मन्त्र यज्ञों में प्रयुक्त होता है, वह यजमान के आयु, सन्तति और पशुओं को क्षति पहुंचाता है। नारदीय शिक्षा में इस बात पर विशेष प्रकाश डाला गया है कि वैदिक मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण करने हेतु शरीरिक व मानसिक दोनो रूप से स्वस्थ होना अत्यावश्यक है।
मुख्य बिन्दु – उच्चारण, वर्ण, वैदिक मन्त्र, वेद, नारदीय शिक्षा, सम्यक्।
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2506S01V13P008
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