मुंशी प्रेमचंद की पत्रकारिता
डॉ. हिरा तुकाराम पोटकुले
श्री. शिवाजीराव पंडित कला, विज्ञान एवं वाणिज्य महाविद्यालय
शिवाजीनगर गढी, जि. बीड, महाराष्ट्र।
potkuleh@gmail.com
सारांश:
प्रेमचंद की लेखनी में जादू है जो समाज पर अच्छा असर छोडती आयी है। उनका कथा साहित्य हो या पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित संपादकिय टिप्पणियाँ, लेखों में गजब की अभिव्यंजनात्मक क्षमता दिखाई देती है।बेजोड़ अभिव्यक्ति शैली होने के कारण बड़ी से बड़ी बात को भी वे बड़ी सरलता और निर्भिकता से कह जाते हैं। प्रेमचंद जी ने हर उस विषय पर अपनी कलम चलाई जिसमें राष्ट्र, समाज और व्यक्ति का हित निहित है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, साहित्य, धर्म, दर्शन, शिक्षा, संस्कृति, समाज, किसान, मजदूर, छूत-अछूत, हिन्दू-मुसलमान, अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति, स्त्री जगत के साथ राष्ट्रभाषा से जुड़े तमाम् मुद्दों पर अपनी कलम चलाकर समाचार पत्रों-पत्रिकाओं में रिपोर्ताज, टिप्पणियाँ और संपादकिय लेख भी लिखे।
पत्रकार प्रेमचंद जी की लेखनी अन्याय, दमण और शोषण के खिलाफ जनता की आवाज बनकर लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित है। उन्होंने अपनी पत्र -पत्रिकाओं के माध्यम से समाज के अंत:करण में परिवर्तन और जागरण की मशाल जलाई है। उन्होंने अपनी पत्रकारिता को सामंती व्यवस्था, सांप्रदायिकता, उच -निच भेद, किसान- मजदूर समस्या और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध वैचारिक हाथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। स्वाधीनता आंदोलन, भारतीय पत्रकारिता और राष्ट्रीयता की कोई भी कहानी, विचार मुंशी प्रेमचंद जी के योगदान की चर्चा के बिना अधूरी ही है। क्योंकि प्रेमचंद जी ने संघर्ष, चिंतन और पत्रकारिता के उन उच्चतम मानकों को स्थापित किया है कि वे आज भी हमें प्रेरणा देते हैं, मार्गदर्शन करते हैं।
बीज शब्द – पत्रकारिता, स्वाधीनता आंदोलन, जागरण, राष्ट्रीयता, परिवर्तन, संघर्ष
DOI link – https://doi.org/10.69758/GIMRJ/2602S02V14P002
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